"We clung to books and to our friends; they reminded us that we had another part to us.” —The Guernsey Literary and Potato Peel Society.
~~बचपन की बातें।~~
किसी दिन,
एक बार फिर
मुझसे कहीं,
मिले तू।
..
भूली अठनी सी, किसी बचपन की छोटी पुरानी शर्ट की पॉकेट से, कभी मिले तू।जिसका पता ना मुझे हो और ना तुझे, फिर भी किसी दिन यूं ही ऐसे ही मिले तू।
..
और यूं ही उस अठनी को देखकर मैं कहीं खो जाऊं,
फिर "हमारे" बचपन में,
जहां कभी तेरे स्कूल ना आने पर,
दिन - दिन नहीं लगता था,
और "मेरी प्यारी दोस्त" पर निबंध
कुछ अधूरा अधूरा सा रह जाता था।
..
बातें यूं ही चलती थी,
किस्सों का एक मेला था,
खाने का डब्बा,
क्या तेरा और क्या मेरा था?
खुशनुमा सा एक मंज़र था।
..
भूली अठनी सी, किसी बचपन की छोटी शर्ट की पॉकेट से, कभी मिले तू।
जिसे कुरेद कर,
मैं उस पर एक बार फिर अपना हक़ दिखा सकूं।
खुशी तुम्हारी हो, जशन मैं मना सकूं।
जन्मदिन तुम्हारा हो,
टॉफियां साथ में,
मैं बांट सकूं।
बचपन की दोस्ती को,
मुक्कमल मैं आज कर सकूं।
..
भूली अठनी सी, किसी बचपन की छोटी शर्ट की पॉकेट से, कभी मिले तू।
जिसका पता ना मुझे हो और ना तुझे, फिर भी किसी दिन यूं ही ऐसे ही मिले तू
..
अगर पुरानी शर्ट नहीं तो शायद किसी किताब के आखरी पन्नों में फसी मिले तू।
जहां बीच क्लास में होती थी,
हमारी छोटी सी दुनिया की बहुत बड़ी बातें,
जो सरसों के खेत से होती हुई,
तारों के शहर के उस पार,
एक दूसरी दुनिया में जा मिलती थी।
जिसका पता न मुझे है
और शायद न तब तुम्हें था।
..
बस इतना मालूम था
कि स्कूल खत्म होते ही,
तुम वहां चली जाओगी।
कब, कैसे, कितने समय के लिए -
इन सब प्रश्न के उत्तर से अनजान,
एक दिन तुम भी बस चली जाओगी।
..
अगर पुरानी शर्ट नहीं तो शायद किसी किताब के आखरी पन्नों में फसी मिले तू।
यादों की इस महफ़िल से निकलकर,
खुले आसमान के नीचे
कभी मिले तू।
जहां बैठकर मैं कर सकूं
फिर वहीं बातें,
और तुम बिन बीते दिनों के कुछ किस्से सुना सकूं।
कुछ तुम्हारी बातें सुनूं,
कुछ अपनी बता सकूं।
..
भूली अठनी सी, किसी बचपन की छोटी शर्ट की पॉकेट से, कभी मिले तू।
जिसे कुरेद कर,
मैं उस पर एक बार फिर अपना हक़ दिखा सकूं।
बचपन की दोस्ती को,
मुक्कमल मैं आज कर सकूं।
- cravenly.kafir✌🏻✍️
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